निंदा और ईष्या का स्वाद

कुछ लोग हर वक्त दूसरे की बुराई (निंदा) करते रहते हैं? लोग बुराई इसलिए करते हैं भई…एक तो निन्दा का रस बडा ही स्वादिष्ट होता है जो एक बार मुँह लग जाए, फिर बार बार चखने को जी चाहता है। इस का स्वाद तो बचपन में ही परिवार व समाज द्वारा चखा जो दिया जाता है..! अहं को संतुष्ट करना होता है कि देखो वह कितना बुरा है और हम कितने अच्छे हैं! जिसका जितना मोटा अहं,उसको निन्दा की खुराक भी उतनी ज्यादा चाहिए होती है ! उन्हें खाया पिया तब तक हज़म ही नहीं होता जब तक वह दिल खोल कर निंदा न कर लें। सुबह आँख खुलने से लेकर रात को सोने तक बस यही करते हैं वह। तभी तो इतने संतुष्ट रहते हैं। ऐसी आत्म तुष्टि शायद ही किसी अन्य काम से संभव हो। आपको पता है स्त्रियाँ नित नियम से कीर्तनों में क्यों जाती हैं? भजन कीर्तन के बाद जो वहाँ सास बहू के पुराण खुलते हैं, जो कथाएँ सुनी सुनाई जाती हैं वही उनके जाने का असली आकर्षण केन्द्र होती हैं। और वही उनका दिन बना देती हैं। पर-निंदा में जो परमानंद है यह वही जानता है जो निरन्तर इसका अभ्यास करता रहता हो। सुस्ती आ रही है? मन कुछ उदास सा है? किसी भी परिचित की निंदा करना शुरू कर दो और देखो सुस्ती कैसे उड़न छू हो जाती है और शरीर स्फूर्ति से भर उठता है। मुझे तो शरीर में ऊर्जा भरने का इससे आसान और फ़ुल प्रूफ़ कोई और तरीक़ा नज़र नहीं आता। किसी अक्लमंद को इस पर एक विज्ञापन बनाने का ज़रूर सोचना चाहिए। साहित्य में नौ रस बताये गये हैं। पर जो आनन्द निंदा रस में है वह किसी अन्य रस में कदापि नहीं। अपने से विद्वान, बुद्धिमान, शक्तिमान इनमें से कोई भी आपके आँख की किरकिरी है, बस तमाम दिन उसकी निंदा करते रहिए, हर मिलने वाले से, हर टेलिफ़ोन वार्ता में। देखिए स्वयं को उससे महान होने की अनुभूति किस कदर आपका मनोबल बढ़ाती है। आपका मूड एकदम बदल जाता है। आपकी वाणी में, चाल में अपने महान होने का गर्व छलक छलक पड़ता है। मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि जब कोई व्यक्ति किसी अनुपस्थित की निंदा करता है तो उसका मुख्य कारण बोलनेवाले की ईर्ष्या होती है बजाय अगले के वास्तविक दोषों के। वह स्वयं को उसके स्थान पर देखना चाहता है परन्तु यह संभव नहीं। अतः निंदा कर के उसका क़द छोटा करने की नाकाम कोशिश करता है। इससे उसके अहम् को तुष्टि मिलती है। इसीलिए शायद बॉस की निंदा मातहतों का प्रिय शग़ल रहा है। बॉस चाहे दफ़्तर का हो, स्कूल कॉलेज का हो या किसी जनरल स्टोर का मैनेजर। चूँकि निंदा ईर्ष्यावश की जाती है अतः ऐसे लोग परनिंदा के संग आत्मप्रशंसा करना नहीं भूलते। जैसे -“मैं तो भई...” सत्य तो यह है कि खुद को बेहतर साबित करने के चक्कर में किसी और की कितनी भी निंदा करें, इसमें उसका कुछ भी बिगड़ने वाला नहीं, उलटे आप ही ईर्ष्या की डाह में जलते रहते हैं। तो क्या यह अच्छा नहीं कि बजाय दूसरों की निंदा में समय और बल गँवाने के उस समय को किसी रचनात्मक कार्य में लगाया जाए? हम हमारे प्रति किसी की सोच नहीं बदल सकते? जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी। जिनकी निंदा-आलोचना करने की आदत हो गई है, दोष ढूंढने की आदत पड़ गई है, वे हज़ारों गुण होने पर भी दोष ढूंढ लेते हैं। और जिनकी गुण ग्रहण करने की प्रकृति है, वे हज़ार अवगुण होने पर भी गुण देख लेते हैं। दुनिया में ऐसी कोई भी चीज/व्यक्ति नहीं है, जो पूरी तरह सर्वगुण संपन्न हो या पूरी तरह गुणहीन हो। एक न एक गुण या अवगुण सभी में होते हैं। आप क्या ग्रहण करते हैं ये आप पर निर्भर करता है। अब जब किसी के अंदर कोई भावना/धारणा किसी के लिए बन जाती है तो उसे बदल पाना मुश्किल होता है। कोई समझा नहीं सकता और कोई समझना नहीं चाहता वाली बात है। First impression is the last impression. संयोग से एक दिन सत्संग में सुनाः निन्दक व्यक्ति निन्दित व्यक्ति के धोबी के समान है। जैसे धोबी कपड़े के मैल को धोता है,वैसे निन्दक निन्दित व्यक्ति के बुरे कर्मों को धो देता है।और तो और निन्दक के बुरे कर्म निन्दा करने से और बढ़ जाते हैं। अब सत्संग तो सच का संग है,मैं वहाँ पर वर्णित किसी बात को असत्य नहीं समझ सकती। हर वक्त दूसरे की बुराई करने वालों, कृपया इस तथ्य पर ध्यान दीजिए और कबीर दास जी के इस दोहे को याद कीजिए,वाकई यह दोहा सबके जीवन का परम सत्य है, कोई भी यहाँ दूध का धुला नहीं है। बुरा जो देखन मैं चला,बुरा न मिलिया कोय। जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।। अतः निन्दा का पत्थर वही मारे जिसने कभी कोई निन्दनीय कार्य न किया हो अन्यथा निन्दक को स्वयं की अंतरात्मा धोबी कहकर ही पुकारेगी! सभी सम्मानित पाठकों का दिल❤️ से अभिनदंन🌺💐🙏

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