बड़ी बेमुरव्वत होती है मोत

बड़ी ही बेमुरव्वत होती है मौत , न वक्त का ख़याल रखती है, न किसी के ओहदे का कोई लिहाज़। न इसे किसी की उम्र से कोई मतलब , न इसे किसी की जिम्मेदारी का कोई एहसास , एकदम खुदगर्ज़ है। कभी इसके आने की आहट भी नहीं मिलती तो कभी यह विकराल रूप धारण कर प्रलय मचा देती है। कोई भूख से मर जाता है तो कोई ज्यादा खाकर , कोई सोते सोते निकल लेता है , तो कोई बाथटब में। कुछ मज़े करने के चक्कर में मौत के लपेटे में आ जाते है। दिल्ली में एक सज्जन अपनी शादीशुदा प्रेमिका से मिलने गए तभी उसका पति भी आ गया , डर के मारे कूद पड़े तीसरी मंज़िल से - खाया-पिया कुछ नहीं और गिलास तोडा बारह आना। एक महाशय अपनी शादी की ख़ुशी में चल बसे तो एक ने शादी न होने के गम में ख़ुदकुशी कर ली। कोई शादी से खुश नहीं था इसीलिए, तो कोई जिंदगी से निराश था इसीलिए , कोई सब कुछ होते हुए भी खुश नहीं था तो कोई उसके पास कुछ नहीं था , इसीलिए जीना नहीं चाहता था। जितने व्यक्ति उतने कारण हो सकते है मौत आने के। राम हो या कृष्ण , रावण हो या विभीषण , राजा हो या रंक हो, साधु हो या संत हो , कोई नहीं बच पाया, यहाँ तक कि लाखो लोगो को मौत के घाट उतारने वाला हिटलर भी खुद को मौत के चुंगल से नहीं बचा पाया। न खुदा का घर इसके प्रकोप से महफूज़ है न भगवान् का मंदिर, धरती हो या अंतरिक्ष , मौत सभी जगह मौजूद है, एक दिन हम सभी को महाप्रयाण पर जाना है। जब मौत तय है तो फिर उसकी क्या चिंता करना , इसीलिए भारतीय संस्कृति में मृत्यु, भय और दु:ख का कोई खास वजूद नहीं है। हमारे दार्शनिकों ने जिस ब्रह्म की अवधारणा को समाज के सामने रखा वह सत् चित् के साथ ही आनंद का स्वरूप भी है। इसी से ब्रह्मानंद शब्द की रचना हुयी है। वह रस, माधुर्य, लास्य का स्वरूप है। भारतीय संस्कृति में मृत्यु एक परिवर्तन का प्रतीक है। हमारे देश में कुछ ऐसे मत, पंथ भी हैं जिनमें शरीर का समय पूरा होने पर खुशी मनाई जाती है। नाच-गाने के साथ, बड़े उमंग और उत्साह से पार्थिव शरीर का अंतिम संस्कार यह मानकर किया जाता है कि जीवात्मा अब अपने स्वामी ब्रह्म से मिलने जा रही है। मिलन की इस पावन बेला मे दु:ख, दर्द और शोक की जरूरत नहीं है। आप मर जाते है तो क्या होता है, कुछ नहीं होता है - जब राम -कृष्ण के जाने से दुनियाँ को कुछ फर्क नहीं पड़ा तो हम यह ग़लतफ़हमी क्यों पाले कि हमारे जाने से दुनियाँ को कोई फर्क पड़ेगा!

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